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उम्मीदों को लगा सरकारी झटका

बुधवार को घोषित नई मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की। अगर सामान्य स्थिति होती तो शायद इसके बारे में बात करने की जरूरत भी महसूस नहीं होती लेकिन नोटबंदी के बाद का यह दौर अर्थव्यवस्था को लेकर तमाम तरह की अटकलों का सबब बना हुआ है।

ऐसे में ब्याज दरों में कटौती न करने का फैसला जमीनी तौर पर ब्याज दरें बढ़ा दिए जाने जैसा प्रभाव लेकर आया है। इस फैसले से बाजार को हुई निराशा की झलक शेयर बाजार की प्रतिक्रिया में दिखी। आरबीआई के गवर्नर ऊर्जित पटेल के बयान के बीच में ही बीएसई और निफ्टी दोनों ऊपर से गिराए गए पत्थर की तरह खट से नीचे आ गए। हालांकि, थोड़ी देर बाद वे संभले, लेकिन रियल स्टेट और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टरों की गिरावट ने उन्हें एक हद से ज्यादा नहीं संभलने दिया। बाजार की इस प्रतिक्रिया को एक तरफ रख दें तो रिजर्व बैंक के फैसले के पीछे उसका अपना मजबूत तर्क है।

अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की बढ़ती कीमतों ने मुद्रास्फीति के मोर्चे पर नई शंकाएं पैदा कर दी हैं। घरेलू मोर्चे पर भी नोटबंदी ने कृषि क्षेत्र को जितना प्रभावित किया है, उसे देखते हुए फरवरी-मार्च तक अनाज और सब्जियों की महंगाई बढ़ना स्वाभाविक लग रहा है। ऐसे में रिजर्व बैंक ने वस्तुस्थिति को स्वीकार करते हुए मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए अनुमानित विकास दर को आधा फीसदी नीचे ला दिया है। यह संशोधित अनुमान कितना सही साबित होता है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के बीतते न बीतते सरकार अर्थव्यवस्था को नोटबंदी के झटके से उबार ले जाएगी। सौ फीसदी सीआरआर (कैश रिजर्व रेश्यो) संबंधी आदेश 10 दिसंबर से वापस लेने का फैसला बैंकों को थोड़ी राहत दे सकता है।

26 नवंबर को जारी आरबीआई के इस आदेश के मुताबिक पुराने नोट वापस कराने या बदलवाने के क्रम में जो भी रकम बैंकों में जमा हो रही थी, वह पूरी की पूरी सीआरआर (यानी बैंकों में रिजर्व बैंक के नाम से आरक्षित रकम) का हिस्सा मानी जानी थी। बैंक इस राशि का इस्तेमाल अपने कारोबार में नहीं कर सकते थे। नतीजा यह कि अपनी सारी तिजोरियां भरी होने के बावजूद बैंकों का नकदी संकट ज्यों का त्यों था।

अब इस आदेश को 10 दिसंबर से वापस ले लिए जाने की घोषणा के बाद बैंक थोड़ी राहत की सांस ले सकते हैं। बहरहाल, अभी तो सबसे बड़ा संकट लोगों के पास नकदी के अभाव का है। इस वजह से जो मांग की कमी बाजार में पैदा हुई है, उसे दूर करने की दिशा में कुछ नहीं हो पा रहा है। इधर काफी समय से रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती करते हुए मांग बढ़ाने की नीति पर चल रहा था। अभी उसने अचानक महंगाई को अपने निशाने पर ले लिया है तो इसे एक तेजरफ्तार गाड़ी के यू-टर्न लेने जैसा ही कहा जाएगा। यह व्यवस्था जितने कम समय के लिए रहे, भारत के लिए उतना ही अच्छा होगा।




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