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जब एंटीबायोटिक दवा असर करना बंद कर दे

मनमर्जी से एंटीबायोटिक दवाइयां खाना या डॉक्टरों अथवा झोलाछाप चिकित्सकों द्वारा रोगी को बार-बार हाई पावर की दवाएं देने से एक वक्त ऐसा भी आता है जब बीमारी में किसी भी तरह की दवा काम नहीं करती। यह स्थिति एंटीबायोटिक रेसिसटेंसी कहलाती है और हाल ही एक अमरीकी महिला की इस कारण से मौत हो गई। इस मरीज पर 13 तरह की एंटीबायोटिक दवाइयों का भी असर नहीं हुआ। चिंताजनक बात यह है कि मरीज के शरीर में यह खतरनाक सुपरबग भारत में इलाज के दौरान पनपा।

यह था केस

दो साल पहले भारत आई 70 वर्षीय महिला को पैर की हड्डी में फ्रेक्चर व इसमें हुए इंफेक्शन के चलते दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती किया गया था। डॉक्टर द्वारा की गई जरूरी जांचों के आधार पर सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार ड्रग रेसिसटेंस वर्ग के एक दुर्लभ बैक्टीरिया से उसके शरीर में ब्लड इंफेक्शन हुआ और सेप्टिक शॉक (इंफेक्शन का रक्त के जरिए अन्य अंगों को नुकसान) के कारण मौत हुई।

दवाओं के बेअसर होने के कारण

मुख्य कारण बैक्टीरिया की पहचान के आधार पर दवा न देना है। अच्छी क्वालिटी, सही तरीके से या दवा का पूरा कोर्स न लेना। एक्सपायरी या रोग की जानकारी के अभाव मेें कोई भी दवा लेना, बैक्टीरिया का स्वत: दवा के प्रति बेअसर होना, किसी अन्य माध्यम से शरीर में आए बैक्टीरिया का शारीरिक संरचना के अनुसार असर।

ऐसे मरीजों को किस तरह दवा देते हैं

ड्रग रेसिसटेंस वाले मरीजों को बीमारी की गंभीरता के अनुसार दवा देते हैं इसलिए कोई भी बैक्टीरियल, फंगल या वायरस जनित रोग में बिना कल्चर टैस्ट के दवा न लें। सही जीवाणु की पहचान के आधार पर ही दवा व उसकी डोज तय होती है। डॉक्टर द्वारा बताए गए तरीके, डोज, समय व निश्चित गैप में दवा लें।

क्या सिरदर्द, पेटदर्द या एसिडिटी जैसी परेशानियों में ली जाने वाली दवाएं ड्रग रेसिसटेंस का कारण बन सकती हैं?

नहीं, ये दवा शरीर में हुए ऐसे अंदरुनी बदलाव के लिए काम करती हैं जो किसी बैक्टीरिया से नहीं हुए हैं। इसलिए इनसे ड्रग रेसिसटेंस नहीं होता। लेकिन इन दवाओं को बिना डॉक्टरी सलाह लेने से निर्धारित अंग से जुड़ी समस्या पर इनका असर धीरे-धीरे कम होने लगता है।

रेसिसटेंस खत्म करने वाली दवाएं भी कई बार काम नहीं करती हैं, ऐसा क्यों?

ज्यादातर मामलों में यदि शरीर में कोई दवा असर करना बंद कर दे तो इस समस्या को ठीक करना मुश्किल हो सकता है। क्योंकि जो बैक्टीरिया धीरे-धीरे एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति असरहीन हो जाते हैं उनपर दूसरी दवाओं का असर नहीं होता। ऐसे में मरीज का इलाज शुरुआत से कर लंबे समय तक चलता है।




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