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यादेंः गुमनाम रह गए अपने हरक्यूलिस

कद सिर्फ चार फीट ग्यारह इंच। सुविधाओं और प्रोत्साहन का तो सवाल ही नहीं। फिर भी मनोहर आइच ने अपनी लगन और जीवटता से बॉडी बिल्डिंग में ऐसी सफलता पाई कि आज तक उसे दोहराया नहीं जा सका है। आज वैश्विक स्तर पर कभी कभार मिलने वालीसफलता चमत्कृत और गौरवान्वित कर देती है। उसका जमकर ढिंढोरा पिटता है और एक दो उपलब्धि के बदले खिलाड़ी सितारा मान लिया जाता है। मनोहर आइच ने तो साठ साल पहले एक दशक तक हर स्तर पर अपना हुनर दिखाया। एशिया में ही नहीं पूरी दुनिया में भारतीय श्रेष्ठता की पहचान कराई। उन्हें ख्याति मिली, मान सम्मान भी मिला लेकिन आज की तरह तब स्टार खिलाड़ियों को पूजे जाने और इनाम-इकराम से लादने का चलन नहीं था। लिहाजा तमाम उपलब्धियों के बावजूद मनोहर आइच अमीर नहीं हो पाए।

सरकारी स्तर पर खिलाड़ियों को सम्मानित करने का सिलसिला भी तब शुरू नहीं हुआ था। इसलिए आइच न अर्जुन पुरस्कार पा सके और न ही पद्म सम्मान। फिर भी अपनी सफलताओं को भुला दिए जाने का दुख उन्होंने कभी नहीं जताया। स्वस्थ शरीर को जीवन का मूल मंत्र मानते हुए उन्होंने लंबे समय तक निरोग रह कर जीवन का सफर तय किया। पिछले साल पांच जून को निधन से 10-15 दिन पहले उन्होंने तरल आहार लेना शुरू किया था। उससे चार साल पहले तक वे नियमित रूप से जिम जाते थे। आइच पहले भारतीय थे जिन्होंने ह्यमिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीता था। 1952 में ज्योति बसु पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा में दाखिल हुए थे। उसी साल उन्होंने यह खिताब अपने नाम किया था।

कुमिल्ला जिले (अब बांग्लादेश में) के धामटी गांव में जन्मे आइच का सौ साल से ज्यादा का सफर रोमांचक तो रहा ही, तमाम तरह की अड़चनों को पार कर उन्होंने साबित कर दिया कि अगर व्यक्ति ठान ले तो किसी भी चुनौती को पार कर सकता है। आजीविका के लिए सियालदाह स्टेशन पर नारियल बेचने वाले आइच को व्यायाम का शौक शुरू से था। यही शौक उन्हें 1942 में रॉयल इंडियन एअरफोर्स में ले गया। वे वहां फिजिकल इंस्ट्रक्टर थे। एक दिन एक ब्रिटिश अफसर ने भारतीयों के बारे में निंदात्मक टिप्पणी कर दी। मनोहर ने उसे जोरदार चांटा जड़ दिया। सजा के तौर पर उनका कोर्ट मार्शल हुआ और उन्हें जेल में डाल दिया गया। जेल में उन्होंने व्यायाम का सिलसिला जारी रखा। आइच की लगन ने जेलर को इतना प्रभावित किया कि उसने उनके लिए विशेष खुराक की व्यवस्था कर दी। रॉयल इंडियन एअरफोर्स के अफसर रेउब मार्टिन ने आइच को बॉडी बिल्डिंग के लिए प्रेरित किया। अब तो बॉडी बिल्डर सप्लीमेंट्स व स्टेरायड के सहारे शरीर बनाते हैं। आइच ने इसके बिना अपना शरीर इतना सुगठित कर लिया कि साथियों में वह ईर्ष्या का विषय बन गया।

आजादी मिलने तक आइच अलीपुर रेजीडेंसी जेल में रहे। जेल में उपकरण नहीं थे। फिर भी रोज 12 घंटे वे व्यायाम करते। विश्व प्रतियोगिता के लिए खुद को तैयार करना उन्होंने अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया था। रिहा होने के बाद वे कोलकाता में बस गए। सुबह जोगेश्वर पाल के अखाड़े में व्यापार करते और फिर सियालदाह स्टेशन पर नारियल बेचते। 1948 में नेशनल एमेच्योर बॉडी बिल्डिंग एसोसिएशन ने यूनिवर्स प्रतियोगिता की शुरुआत की। 1950 में आइच ने मिस्टर हरक्यूलिस का खिताब जीता। उनके छोटे कद की वजह से तब उनका नाम पॉकेट हरक्यूलिस पड़ गया। 1951 में नई दिल्ली में हुए पहले एशियाई खेलों आइच ने बॉडी बिल्डिंग में स्वर्ण पदक जीता।

मिस्टर यूनिवर्स में हिस्सा लेने के लिए इंग्लैंड जाने लायक पैसे की व्यवस्था करना बड़ी समस्या थी। जादूगर पीसी सरकार सीनियर के साथ मिल कर उन्होंने बॉडी बिल्डिंग का शो शुरू कर दिया। ‘फिजिक एंड मैजिकह्ण नाम का यह शो काफी लोकप्रिय हुआ। इंग्लैंड जाने के लिए पैसे की व्यवस्था हो गई। 1951 में वे खिताब जीत नहीं पाए। उन्होंने लंदन में ही रुकने का फैसला कर लिया। संयोग से ब्रिटिश रेल में उन्हें नौकरी मिल गई। 1952 में मिस्टर यूनिवर्स का खिताब जीत कर ही वे भारत लौटे। प्रसंगवश यही खिताब पांच साल बाद आस्ट्रिया के आर्नोल्ड श्वाजर्नेगर ने जीता जिसकी बदौलत वे हॉलीवुड की फिल्मों के सफल एक्शन हीरो बने।

मनीला में 1954 में और तोक्यो में 1958 में हुए एशियाई खेलों में आइच ने स्वर्ण पदक जीता। इसके अलावा एशियाई बॉडी बिल्डिंग चैंपियनशिप में भी उन्होंने फतह हासिल की। मनोहर आइच शरीर को मंदिर कहते थे। उनका मानना था कि स्वस्थ रह कर शरीर की पूजा करनी चाहिए। आर्थिक संकट आइच के सामने हमेशा मुंह बाए खड़ा रहा। अड़चनों की परवाह न कर उन्होंने खुद को हमेशा तनाव मुक्त रखा। पैसा कमाने के लिए छोटी उम्र से ही संघर्ष करने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और हर परिस्थिति में खुश रहने का रास्ता अपनाया। संयमित आहार उनकी सफलता का आधार रहा। वे हमेशा एक वाक्य दोहराते थे- ‘थोड़ा चावल खाने से ताकत दुगनी होगी। ज्यादा खाओगे तो आलसी हो जाओगे।’ मनोहर आइच मच्छी-भात के साथ दूध, फल और सब्जियों का नियमित सेवन करते थे। 2011 में आइच को दिल का दौरा पड़ा। लेकिन घर में ही बने जिम में जाना उन्होंने बंद नहीं किया। बॉडी बिल्डरों को तैयार करने में उनकी रूचि हमेशा रही।

12 साल की उम्र में काला अजार की चपेट में आने की वजह से उनका शरीर काफी कमजोर हो गया था। लिहाजा आइच को एक के बाद कई बीमारियों का सामना करना पड़ा। नियमित व्यायाम कर उन्होंने अपना शरीर सुगठित किया। 1952 में जब उन्होंने ‘मिस्टर यूनिवर्स’ का खिताब जीता, उनका सीना 54 इंच का था और कमर 23 इंच की। बढ़ती उम्र के बावजूद 1955 और 1960 की मिस्टर यूनिवर्स प्रतियोगिता में भी उन्होंने हिस्सा लिया। 2003 में आखिरी बार बॉडी बिल्डंग शो में हिस्सा लेकर मनोहर आइच भरी पूरी गृहस्थी में रम गए।




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