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पलामू टाइगर्स प्रोजेक्ट : बेतला के जंगलों में ढूंढ़े नहीं मिलते बाघ

झारखंड में बाघों के संवर्धन और विकास के नाम पर पिछले चार दशक में पलामू व्याघ्र परियोजना के नाम पर अब तक करोड़ों रूपए पानी की तरह बहा दिए गए. पर बाघों की संख्या बढ़ने की जगह घटती चली गई. सच्चाई से दूर कागजी आकड़ों में भले ही झारखंड का बेतला व्याघ्र परियोजना सफल होती रही, पर हकीकत ये है कि बाघ अब बेतला के जंगलों में ढूंढ़े नहीं मिलते.

देश में बाघों की कम होती संख्या से चितिंत सरकार ने वर्ष 1973 में तत्कालीन बिहार और वर्तमान झारखंड के पलामू के बेतला में पलामू टाइगर्स प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी. हर वर्ष पलामू टाइगर प्रोजेक्ट पर सरकार करोड़ों रूपए खर्च करती है. पर, योजना के चार दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद हालात ये है कि बाघ बेतला के जंगलों में हैं ही नहीं. साल दर साल बाघों की संख्या क्यों कम हो गई इसका जवाब वन विभाग के पास भी नहीं है.

ग्राफिक्स के जरिए जानिए पलामू टाइगर प्रोजेक्ट की स्थिति –

* झारखंड के वनों में बाघों की संख्या नगण्य

* पलामू टाइगर प्रोजेक्ट क्षेत्र की स्थिति बेहद खराब

* वर्ष 2012 के सरकारी आंकड़ों में कोर और बफर एरिया में नहीं बचें हैं बाघ
* ताजा सरकारी आंकड़ों में भी महज तीन बाघ होने का दावा
* बाघ नर, मादा या बच्चे यह भी स्पष्ट नहीं
* हर वर्ष 20 करोड़ से ज्यादा राशि होती है खर्च
* सच्चाई को छुपाने की हमेशा रची जाती है साजिश
* बेतला के बाघ कहां चले गए इससे अंजान है विभाग
* न्यायालय में विभाग ने हलफनामा देकर कहा- छत्तीसगढ़ चले गए हैं कई बाघ

विशेषज्ञों की मानें तो 1973 से अब तक करीब 123 बाघ बेतला से गायब हो गए. इसकी वजह भी साफ है. बाघों को न आसमान निगल गया न जमीन खा गई बल्कि बाघ तो हमारी जंग लगी व्यवस्था का शिकार हो गए.

बाघ प्रेमी, विशेषज्ञ और पर्यावरणविद भले ही बाघों की संख्या को लेकर चिंतित हों. पर राज्य का वन विभाग तो चिंता को बेवजह करार देता है. वन विभाग में भ्रष्टाचार के खिलाफ आरटीआई के माध्यम से लगातार आवाज उठानेवाले और पलामू क्षेत्र में पांच वर्ष से ज्यादा समय तक वनक्षेत्र पदाधिकारी रहे आनंद कुमार अपने ही विभाग के दावों पर सवाल खड़े करते हैं बल्कि पलामू व्याघ्र परियोजना को लेकर बड़े बड़े दावों की पोल खोल देता है.




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