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क्या हिंद महासागर में प्रभुत्व के लिए मालदीव बनेगा भारत-चीन की रणभूमि?

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी है. वहां राजनीतिक संकट के हालात से दुनिया के कई देश परेशान हैं, इससे खासकर हमारे देश में चिंता बढ़ गई है. वहां के विपक्षी नेताओं का कहना है कि मौजूदा राष्ट्रपति पूरी तरह से चीन के प्रभाव में हैं. तो क्या मालदीव हिंद महासागर में प्रभुत्व के लिए भारत-चीन की रणभूमि बन जाएगा? मालदीव को लेकर क्या है चीन का खेल और क्यों है भारत को चिंता, आइए जानते हैं.

मालदीव हिंद महासागर में सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है. यह हमारे देश के लक्षद्वीप समूह से महज 700 किमी. दूर है. मालदीव एक ऐसे महत्वपूर्ण जहाज मार्ग से सटा हुआ है जिससे होकर चीन, जापान और भारत जैसे कई देशों को ऊर्जा की आपूर्ति होती है. चीन ने श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीकी देश दिजिबूती में बंदरगाह बनाकर हिंद महासागर में अपनी स्थ‍िति मजबूत कर ली है. भारत को यदि हिंद महासागर में अपनी स्थिति मजबूत करनी है तो मालदीव उसके लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

मालदीव के राष्ट्रपति ने पश्चिमी देशों के दबाव और भारत पर निर्भरता को कम करते हुए चीन से पींगें बढ़ाई हैं. चीन ने एंटी पायरेट्स अभियान के नाम पर दस साल पहले हिंद महासागर में अदन की खाड़ी तक अपने नौसैनिक जहाज भेजने शुरू किए. इसकी वजह से मालदीव का महत्व लगातार बढ़ता गया और अब यह अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति का केंद्र बन गया है. चीन ने पिछले साल मालदीव के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया है.

चीन का मालदीव के साथ बढ़ता आर्थिक सहयोग भारत के लिए चिंता की बात है. मालदीव के विदेशी कर्ज में करीब 70 फीसदी हिस्सा चीन का हो गया है. इसके पहले दशकों तक मालदीव के भारत के साथ करीबी रिश्ते रहे हैं. वहां चीन का दूतावास 2011 में ही खुला है. भारत इसके काफी पहले 1972 में ही वहां अपना दूतावास खोल चुका था. एशिया में अपना राजनीतिक-सामरिक प्रभाव रखने के मामले में चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारत ही पेश कर रहा है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आक्रामक तरीके से हिंद महासागर में चीन के भू-सामरिक प्रधानता पर अंकुश लगाने के प्रयास किए हैं. इसमें भारत को अमेरिका और जापान का सहयोग मिल रहा है.

 साल 2013 में यामीन के सत्ता में आने के बाद ही वहां राजनीतिक रूप से स्थ‍िरता नहीं बन पाई है. उन्होंने कई राजनीतिज्ञों को जेल में डाला है और मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है. उन्होंने मालदीव में चीन और सऊदी अरब के निवेश को बढ़ावा दिया है. इसके लिए विपक्षी दल उनकी कड़ी आलोचना करते रहे हैं. वहां के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने इस बार संकट के दौर में भारत से सैन्य हस्तक्षेप करने की मांग की है, ताकि वहां राजनीतिक कैदियों को छुड़ाया जा सके और जजों को सुरक्षा मुहैया किया जा सके. भारत मालदीव के लोकतंत्र समर्थक ताकतों का समर्थन करता रहा है और भारत को डर है कि उसकी मदद न करने पर ये ताकतें चीन और सऊदी अरब की शरण में जा सकती हैं.

मालदीव में साल 2017 में सबसे ज्यादा 3 लाख चीनी पर्यटक पहुंचे हैं. चीन मालदीव की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश कर रहा है. हाल में एक चीनी कंपनी को राजधानी माले के पास रिजॉर्ट बनाने के लिए एक द्वीप 50 साल के लिए लीज पर मिला है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों को यह बेहद चिंताजनक बात लगती है, क्योंकि वहां चीन उसी तरह की गतिविधियां शुरू कर सकता है, जैसा कि उसने दक्षिण चीन सागर में किया है.




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