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राजद के लिए लालू ने बनाई आपदा प्रबंधन टीम, राजनीतिक संकट से निपटने की पूरी तैयारी

चारा घोटाले में लालू प्रसाद के जेल जाने के बाद राजद पर आए राजनीतिक संकट से निपटने के लिए नेतृत्व ने मुकम्मल तैयारी कर ली है। लालू के निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित होने के करीब ढाई महीने बाद सभी नकारात्मक पहलुओं पर गौर फरमाते हुए बुधवार को राष्ट्रीय टीम का एलान कर दिया गया। 83 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आपदा प्रबंधन का गणित साफ नजर आ रहा है। नई टीम में कई तरह के व्यवधान से निपटने का फार्मूला दिख रहा है।

राबड़ी को उपाध्यक्ष बना वैधानिक संकट टालने की कोशिश

पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को उपाध्यक्ष और भोला यादव को महासचिव में प्रोन्नति देकर लालू ने पार्टी पर आने वाले वैधानिक संकट को टालने की सबसे पहले कोशिश की है। दरअसल, सजायाफ्ता लोगों के पार्टी बनाने और पार्टी पदाधिकारी बनने पर रोक की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर दो जनहित याचिकाओं पर 12 फरवरी को सुनवाई होनी है।

राजद के रणनीतिकारों को आशंका है कि कोर्ट का फैसला खिलाफ आने पर लालू को अध्यक्ष पद से हाथ धोना पड़ सकता है। ऐसे में कार्यकारी व्यवस्था के लिए राबड़ी देवी को अधिकृत करना आसान होगा। पिछली टीम में राबड़ी महज कार्यकारिणी की सदस्य भर थीं। पुराने पद पर रहते हुए वह कार्यकारिणी की बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकती थीं।

लालू परिवार के अतिरिक्त किसी को यह जिम्मेदारी देने पर नेतृत्व का संकट खड़ा हो सकता था। रघुवंश प्रसाद सिंह, शिवानंद तिवारी, जगदानंद सिंह और अब्दुल बारी सिद्दीकी सरीखे नेताओं को राबड़ी के नाम पर आपत्ति नहीं होगी। हालांकि पार्टी संविधान के मुताबिक लालू सदस्य को भी वैकल्पिक व्यवस्था के लिए अधिकृत कर सकते हैं, लेकिन वह तर्कसंगत नहीं होता।

परंपरागत माय समीकरण से आगे निकलने की जुगत

राजद की नई टीम में राजनीतिक वारिस को लेकर भी लालू का आपदा प्रबंधन नजर आ रहा है। तेजस्वी यादव के युवा नेतृत्व में राजद अपने परंपरागत माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण से आगे की राजनीति करने की कोशिश में जुटा है।

यही कारण है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी में यादवों की संख्या सीमित करके सभी प्रमुख वर्गों एवं समुदायों को साधने की कोशिश की गई है। मुस्लिमों के अलावा अति पिछड़ों एवं दलितों को भी पर्याप्त भागीदारी दी गई है। सवर्णों की कुछ खास जातियों को भी पहले की तुलना में ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। बड़े सवर्ण नेताओं की अहमियत भी बरकरार है।




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